Friday, September 25, 2026

नज़र आई है ( ग़ज़ल )

नज़र आई है ( ग़ज़ल )

मेरे अरमानों की ख़ातिर तू नज़र आई है,
दिल में छुपी थी जो, वही अब नज़र आई है।

तेरी यादों में बसी एक तन्हाई नज़र आई है,
सूनी रातों में तेरी परछाई नज़र आई है।

तेरे जाने से हुई दिल में जो रुसवाई नज़र आई है,
मेरी आँखों में मोहब्बत की गहराई नज़र आई है।

तेरे आने की ख़बर पाकर जो अंगड़ाई नज़र आई है,
सूखे होंठों पे फिर से मुस्कुराई नज़र आई है।

जी आर, तेरी ग़ज़ल में दिल की गहराई नज़र आई है,
हर एक मिसरे में तेरी ही परछाई नज़र आई है।


जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

खामोशी का जवाब

खामोशी का जवाब

एक सवाल बनकर आई आहट
होंठों पर ही ठहर गई,
उत्तर खोजती निगाहें
दूर कहीं देखती रहीं।

कहने को बहुत कुछ था,
फिर भी स्वर राह में खो गया,
अर्थहीन शब्दों से कहीं अधिक
मौन सच्चा लगा।

समय कुछ उत्तर ऐसे देता है
जिन्हें पूछना नहीं पड़ता,
बंद दरवाज़ों के उस पार
रास्ते स्वयं उजागर होते हैं।

जिसे खोना समझा था कभी,
वह किसी और रूप में लौट आता है,
और जब खामोशी लंबी हुई,
उत्तर भीतर ही जन्म ले चुका था।

जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

कदमों की आहट सुनता घर

कदमों की आहट सुनता घर

बंद पड़े दरवाज़े के उस पार
जैसे कोई गुज़र जाता है,
पुरानी लकड़ी की तख़्तियों के बीच
एक आहट धीरे से जागती है।

जब हवा शीशे को छूती है,
परदा हल्के से काँप उठता है,
और समय द्वारा भुला दी गई
एक शाम की ख़ुशबू फैल जाती है।

सीढ़ियों के मोड़ पर
अचानक एक परछाईं उभरती है,
ऊपरी द्वार के पीछे
एक सपना अब भी अनखुला है।

दीवार पर टँगी तस्वीर में
वह मुस्कान अब भी जीवित है,
और खाली पड़ी कुर्सी पर
किसी की मौजूदगी अभी शेष है।

कभी यहाँ गूँजी हँसी की
वह धीमी-सी प्रतिध्वनि,
आज भी गलियारे से होकर
किसी अनजानी राह पर चलती है।

रात गहराती है तभी
यह पुराना आशियाना जागता है;
कोई अदृश्य उपस्थिति
अंदर की गहराइयों को छूती हुई गुजरती है।

सुबह की रोशनी आते ही
सब फिर शांत हो जाता है,
फिर भी बीता हुआ समय
फ़र्श पर अपनी एक रेखा छोड़ जाता है।

लोग भले ही दूर चले जाएँ,
उनके स्नेह का स्पर्श
इन दीवारों के बीच
समय से संवाद करता रहता है।

जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

आँसू का बीज

आँसू का बीज

गालों से उतरती वह बूँद
जब चुपचाप धरती पर गिरी,
किसी अनदेखे पल में
धरती ने अपना हृदय खोल दिया।

जो कुछ कह न सके कभी,
वह मौन में घुलता गया,
टूटी हुई उम्मीदें
गहराई में सोती रहीं।

समय की तपती धूप में भी
वह नमी सूख न सकी,
अँधेरे की गहराइयों में
धीरे-धीरे जीवन जाग उठा।

फिर एक सुबह
सूखी डाल पर हरियाली लौटी,
और कभी झुका हुआ हृदय
फिर आकाश की ओर उठ गया।

तभी समझ आया—
विछोह का मौन भी
सृजन की शक्ति रखता है;
नीचे गिरी हर बूँद
रोशनी की ओर उठने का
एक स्वप्न सँवार रही थी।

जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

विस्मृति के उस पार

विस्मृति के उस पार

जिसे भूल जाना चाहा था,
वही मन में फिर उभर आता है,
जैसे धुंधली-सी तस्वीर में
रंग धीरे-धीरे जाग उठते हैं।

समय से सहलाए घावों पर
जब केवल निशान रह जाते हैं,
कहा न गया कोई एक शब्द
फिर से हृदय में गूँज उठता है।

जो राहें दूर निकल गई थीं,
वे स्मृतियों में लौट आती हैं,
जिन पत्थरों पर कभी चले थे,
वे भी परिचित स्वर में बोलते हैं।

कुछ चेहरे, कुछ पल,
जिन्हें विस्मृति में खोया समझा था,
अचानक हवा के झोंके बनकर
फिर सामने आ जाते हैं।

जिन आँसुओं ने कभी भिगोया था,
वे आज मोती बन गए हैं,
जो समय कभी पीड़ा लगा था,
वही आज एक सीख बन गया है।

भूल जाना मुक्ति नहीं,
स्मृतियों से शांति करना है;
और विस्मृति के उस पार
हमारी प्रतीक्षा में
हम स्वयं ही खड़े मिलते हैं।

जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

सोता नहीं वह दरवाज़ा

सोता नहीं वह दरवाज़ा

आधी रात भी बीत गई,
पर दरवाज़ा अब भी सोया नहीं,
हवा की उँगलियाँ आकर
धीरे से उस पर दस्तक देती हैं।

दहलीज़ के पास पड़ा है
किसी पुराने पदचिह्न का स्मरण,
जो कभी लौटकर नहीं आया,
उसकी परछाईं आज भी वहीं ठहरी है।

ठंडी पड़ी चाबी की दरार में
चाँद एक आँख बनकर ठहरता है,
और भीतर का सारा मौन
बाहर निकलने की राह खोजता है।

कितनी यात्राएँ देखीं इस दरवाज़े ने,
कितनी विदाइयाँ देखीं;
मुस्कुराकर जाने वालों में से
कुछ फिर कभी लौटे ही नहीं।

बरामदे का दीपक बुझ जाए फिर भी
यह दरवाज़ा आँखें नहीं मूँदता,
किसी के लौट आने का विश्वास
आज भी इसमें ठहरा है।

जब भोर की पहली किरण
दहलीज़ पर आकर गिरती है,
तब भी यह खुला नहीं, प्रतीक्षारत रहता है—
क्योंकि उम्मीद के कोई दरवाज़े नहीं होते।

जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Tuesday, September 22, 2026

बरसे नैना ( ग़ज़ल )

बरसे नैना ( ग़ज़ल )
बरसे नैना, तरसे जैसे बिखरे बादल की तरह
बिरहा में ढूँढूँ तेरे पदचिह्न, पागल की तरह

तेरी यादों के बादल दिल पे बरसते रहे
हम तड़पते ही रहे इक पागल की तरह

तेरे जाने से ये दिल हो गया कितना घायल
दर्द छुपता ही नहीं, कोई घायल की तरह

तेरी आहट की तलाश में भटकता है दिल
हर निशाँ दिखता रहा फिर भी ओझल की तरह

तेरी तस्वीर को सीने से लगाए रखा
इश्क़ में जीते रहे तेरे कायल की तरह

जी आर, तेरी ग़ज़ल में वही तेरा ग़म है
दिल ने हर दर्द को लिख डाला बादल की तरह

जी आर कवियुर 
22 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर


Friday, September 18, 2026

പൂക്കളെ ചിത്രശലഭങ്ങൾ | फूलों को तितलियाँBilungal gazhal by GR kaviyoor

പൂക്കളെ ചിത്രശലഭങ്ങൾ | फूलों को तितलियाँ

Bilungal gazhal by GR kaviyoor 

പൂക്കളെ ചിത്രശലഭങ്ങൾ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു,
നിൻ ഓർമ്മകൾ എന്നെയും നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

फूलों को तितलियाँ सताती हैं,
तेरी यादें मुझे भी सताती हैं।

മൗനത്തിൻ താഴ്‌വരയിൽ തനിച്ചിരിക്കുമ്പോൾ,
പറയാതെ പോയ വാക്കുകൾ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

ख़ामोशी की वादियों में जब मैं तनहा होता हूँ,
कहे बिना रह गए लफ़्ज़ बहुत सताते हैं।


നിലാവിൻ ജാലകത്തിലൂടെ നിന്നെ തിരയുമ്പോൾ,
തിരികെ വരാത്ത രാത്രികൾ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

चाँदनी की खिड़की से तुझे जब ढूँढता हूँ,
गुज़र गईं जो रातें, बहुत सताती हैं।


വസന്തം പൂക്കളുമായി മുറ്റത്തെത്തുമ്പോൾ,
നീ തന്ന സമ്മാനങ്ങൾ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

जब बहार फूलों को लेकर आँगन में उतरती है,
तेरी दी हुई सौग़ातें बहुत सताती हैं।


തിരകളായ് തീരത്തെത്തും ഓർമ്മകളെല്ലാം,
പിരിയാതെ നിന്ന നിമിഷങ്ങൾ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

लहरों की तरह यादें जब साहिल से टकराती हैं,
तेरे साथ बिताई घड़ियाँ बहुत सताती हैं।

ജീ ആർ, ഹൃദയത്തിൽ കുറിച്ചുവെച്ച പ്രണയവരികൾ,
മായാതെ നിൽക്കുമ്പോൾ അവ നൊമ്പരപ്പെടുത്തുന്നു.

जी आर, दिल में लिखी मोहब्बत की वो दास्ताँ,
मिटती नहीं, इसलिए बार-बार सताती है।

जब घड़ी रुक गई


जब घड़ी रुक गई

दीवार पर समय की सुइयाँ
जब एक जगह आकर ठहर गईं,
दौड़ती हुई ज़िंदगी भी जैसे
एक पल को साँस लेने लगी।

खिड़की के बाहर का नज़ारा
आज कुछ ज़्यादा शांत लगा,
कमरे की गहरी ख़ामोशी में
एक पुरानी मुस्कान सुनाई दी।

मेज़ पर रखी उस तस्वीर में
एक भूला हुआ चेहरा था,
उन आँखों ने मिटा दीं दूरियाँ
जिन्हें बरसों ने बढ़ाया था।

कुछ पलों की कीमत भला
किसी घड़ी से आँकी जा सकती है?
दिल में सँजोई हुई यादों को
समय भी कभी मिटा नहीं सकता।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

शब्दों से पहले का प्यार

शब्दों से पहले का प्यार

जब तुम बिना कुछ कहे आए,
दिल ने तुम्हें पहचान लिया,
एक मुस्कान की छाँव तले
एक रिश्ता चुपचाप बन गया।

बिना पूछे तुम समझ गए
आँखों की हल्की सी नमी,
बिना कहे ही थाम लिया
जब भी डगमगाई ज़िंदगी।

दूर खड़े होकर भी तुम
हमेशा पास से लगे,
खामोशियों के उन पलों में
दिल के गीत खुद ही जगे।

शब्दों के जन्म से पहले ही
प्यार हमारे बीच खिला था,
जो बात कभी कही न गई
वही रिश्ता आज भी मिला था।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

अनखुला ख़त

अनखुला ख़त

एक पुरानी सी संदूक में
एक ख़त अब भी रखा है,
समय मिटा न सका उन शब्दों को
जो उसमें अब तक लिखा है।

लिखने वाले हाथ बदल गए,
पढ़ने वाली आँखें दूर हुईं,
फिर भी हर एक अक्षर में
कुछ अधूरी बातें छिपी रहीं।

कई बार मन हुआ खोलूँ उसे,
मगर उँगलियाँ रुक गईं,
डर था कि सोई हुई यादें
फिर से जाग न जाएँ कहीं।

शायद कुछ ख़त अनखुले ही
दिल के लिए बेहतर होते हैं,
कहे बिना रह गए जज़्बात
यूं ही पवित्र बने रहते हैं।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

अपनी परछाई से आगे निकल गया

अपनी परछाई से आगे निकल गया

पीछे चलती परछाई को
उसने मुड़कर देखा नहीं,
राह कठिन थी सामने फिर भी
कदम कभी पीछे रखा नहीं।

गुज़रे हुए उन दिनों को
यादों में उसने सहेज लिया,
हार गए जिन पलों से कभी
वहीं से हौसला ले लिया।

रास्ते में बाधाएँ आईं,
फिर भी वह रुका नहीं,
अपने भीतर की रोशनी लेकर
किसी मोड़ पर झुका नहीं।

जब आखिर पीछे मुड़कर देखा,
परछाई भी पीछे रह गई,
खुद को जीत चुका था जो इंसान,
उसकी राह नई बन गई।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

टूटी डाल पर खिला फूल


टूटी डाल पर खिला फूल

टूटी हुई एक डाल के सिरे पर
एक नन्हा फूल खिल आया,
हवा ने जब धीरे से छूकर उसे,
वह चुपके से मुस्कुराया।

सहारा देने वाला कोई न था,
फिर भी रंग बिखेरता रहा,
गिर जाने के डर को भूलकर
सूरज की ओर देखता रहा।

जिन राहों पर दर्द मिला हो,
वहाँ उम्मीद मरती नहीं,
एक छोटे से फूल के भीतर भी
जीवन की कमी होती नहीं।

घायल शाख पर भी एक सपना
नई सुबह बनकर आया,
उस फूल की सुंदरता ने मुझको
जीना फिर से सिखलाया।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Thursday, September 17, 2026

तेरी ख़ामोशी

तेरी ख़ामोशी

तेरी ख़ामोशी ने मुझे
लिखने की आदत दी,
मेरी बदतमीज़ी की
कमीज़ फाड़कर रख दिया।

जो शब्द ज़ुबाँ तक आकर
हर बार लौट जाते थे,
तेरी आँखों ने उन शब्दों को
काग़ज़ पर उतार दिया।

मैं ख़ुद को समझता रहा
बेपरवाह और बेख़बर,
तेरी एक ख़ामोश नज़र ने
मेरा सारा गुरूर उतार दिया।

अब दर्द भी शायरी है,
और ख़ामोशी भी ग़ज़ल,
तूने कुछ कहा भी नहीं—
फिर भी मुझे लिखना सिखा दिया।

जी आर कवियुर 
17 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Wednesday, September 16, 2026

ज़िंदगी एक कारवाँ

ज़िंदगी एक कारवाँ


ज़िंदगी है क्या, ज़िंदादिलों का कारवाँ,
हर कदम पर मिलती नई एक दास्ताँ,
ग़म की घटाएँ हों या खुशियों की बहार,
चलते रहें तो खिलता रहे आसमाँ।

राहों में काँटे हों या फूलों की महक,
हौसला हो दिल में तो आसान हर सफ़र,
हार को भी जीत में बदल दे ये जुनून,
मुस्कुराते चल पड़े तो मिटे हर डर।

कल की फ़िक्र छोड़, आज को सँवार ले,
बीते लम्हों से कुछ सीख, आगे निहार ले,
ज़िंदगी तो नाम है चलते रहने का,
हर नई सुबह को दिल से पुकार ले।

दोस्तों के साथ हो तो राहें हसीन हैं,
अपनों की मोहब्बत में खुशियाँ यक़ीन हैं,
दिल में उम्मीद हो, आँखों में रोशनी,
ज़िंदगी के रंग फिर कितने रंगीन हैं।

जी आर कवियुर 
16 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Saturday, September 12, 2026

तेरे जाने के बाद (ग़ज़ल)

तेरे जाने के बाद (ग़ज़ल)

सुकूँ फिर दिल को मिला तेरे जाने के बाद,
हर एक बात में गिला तेरे जाने के बाद।

उदास शाम ने पूछा मेरा हाल-ए-दिल,
कोई जवाब न मिला तेरे जाने के बाद।

तमाम उम्र जिसे अपना समझ के चाहा,
वही तो दूर जा बसा तेरे जाने के बाद।

मन का दीप भी बुझा, रोशनी भी रूठ गई,
अँधेरा मन में पला तेरे जाने के बाद।

तेरी यादों ने मगर साथ मेरा छोड़ा नहीं,
हर एक घाव फिर खिला तेरे जाने के बाद।

न जाने कौन-सा रिश्ता था तुझसे ऐ हमदम,
कि ख़ुद से भी मैं जुदा तेरे जाने के बाद।

‘जी आर’ मन को तेरी याद से बहलाता रहा,
मगर न दर्द ये टला तेरे जाने के बाद।

रचनाकार
जी आर कवियुर  
13 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर)

हज़ार बार (ग़ज़ल)

हज़ार बार (ग़ज़ल)
हज़ार बार तुझसे मिन्नतें किया करते हैं,
 तेरा ही चेहरा दिल में लिए प्यार किया करते हैं।

तेरी राहों में बिछी रहती हैं मेरी नज़रें, 
तेरे आने का हर पल इंतज़ार किया करते हैं।

तेरी ख़ामोश निगाहें बहुत कुछ कहती हैं,
 हम उन्हीं आँखों से दिल का इज़हार किया करते हैं।

तेरी तस्वीर को सीने से लगा रखते हैं, 
तेरे दीदार की ख़ातिर दिल बेकरार किया करते हैं।

तेरी उल्फ़त ने हमें ऐसा बना दिया है, 
हर ख़ुशी तेरे नाम से निसार किया करते हैं।

‘जी आर’ तेरी यादों में ग़ज़ल लिखते हैं, हर एक शेर को तेरा ही दीदार किया करते हैं।


रचनाकार
जी आर कवियुर  
12 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Thursday, September 10, 2026

न मिटने वाले शब्द

न मिटने वाले शब्द

कुछ पल दिल में गहराई से उतर जाते हैं,
कुछ आवाज़ें खामोशी में भी सुनाई देती हैं।
अनजाने में कहा गया एक शब्द भी,
वक़्त से न मिटने वाला निशान बन जाता है।

कहने वाला मन आगे बढ़ जाता है,
पर सुनने वाला दिल वहीं ठहर जाता है।
मुस्कान के पीछे छिपा हुआ दर्द भी,
कभी एक पंक्ति में झलक जाता है।

कितने ही दिन बीत जाएँ फिर भी,
उसका अर्थ कभी धुंधला नहीं पड़ता।
कुछ एहसास आख़िरी साँस तक रहते हैं,
दिल के पन्नों पर सदा जीवित रहते हैं।

जी आर कवियुर 
10 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

न मिटने वाले शब्द

न मिटने वाले शब्द

कुछ पल दिल में गहराई से उतर जाते हैं,
कुछ आवाज़ें खामोशी में भी सुनाई देती हैं।
अनजाने में कहा गया एक शब्द भी,
वक़्त से न मिटने वाला निशान बन जाता है।

कहने वाला मन आगे बढ़ जाता है,
पर सुनने वाला दिल वहीं ठहर जाता है।
मुस्कान के पीछे छिपा हुआ दर्द भी,
कभी एक पंक्ति में झलक जाता है।

कितने ही दिन बीत जाएँ फिर भी,
उसका अर्थ कभी धुंधला नहीं पड़ता।
कुछ एहसास आख़िरी साँस तक रहते हैं,
दिल के पन्नों पर सदा जीवित रहते हैं।

जी आर कवियुर 
10 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Tuesday, September 8, 2026

मन का रहस्यमय नक्शा

मन का रहस्यमय नक्शा

एक नक्शा है, रेखाओं से परे,
मेरे मन की गहराइयों में,
भटके हुए सपने भी जहाँ
अपने घर की राह पहचानते हैं।

कुछ अनकहे शब्द छिपे हुए हैं
अनदेखी घाटियों के भीतर,
छुए बिना रह गई प्रेम की नदियाँ
चुपचाप बहती हैं अंतर्मन में।

यादों की पहाड़ी ढलानों पर
एक पुराना समय ठहरा है,
जहाँ कदम कभी पड़े ही नहीं,
वहीं अनजाने कल बुलाते हैं।

उस नक्शे को कोई पढ़ न सका,
मैं भी उसकी राहें पूरी नहीं जानता;
हर नई सुबह आँखें खोलती है,
मन एक नई राह फिर बनाता है।

जी आर कवियुर 
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

वह कदम जो लौटकर नहीं आया


वह कदम जो लौटकर नहीं आया

आँगन की मिट्टी पर रह गया
एक कदमों का निशान,
जो मिटने का नाम न लेता था,
द्वार पर ठहरी थी उम्मीद।

कितनी साँझें बीत गईं,
राहें चुप होती चली गईं;
हवा में सुनाई दी हर आहट को
दिल ने समझा — तुम लौट आए।

बारिश आई, राह धुल गई,
फिर भी निशान रहा मन में;
वर्षों के बीत जाने पर भी
यादों की उम्र नहीं बढ़ती।

अंततः समझ आया मुझे —
तुम लौटने वाली दूरी से परे हो;
फिर भी उसी पदचिह्न के पास
मेरा इंतज़ार आज भी है।

जी आर कवियुर 
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

जड़ों से विहीन वृक्ष


जड़ों से विहीन वृक्ष

माटी की गोद में जगह न पाकर
एक वृक्ष खड़ा है अकेला,
हवा के हाथों झूमते हुए भी
आँखों में वन की स्मृतियाँ लिए।

जड़ों को खोजती हुई नीचे तक
एक लंबी खामोश परछाईं,
जिस मिट्टी को छुआ वह पराई थी,
छाँव को भी अपना घर न मिला।

एक बूढ़ा पंछी आया था,
डाली पर घोंसला बनाने को;
बची हुई हरियाली के बीच
बस बीता कल गाता रहा।

जड़ें नहीं थीं फिर भी वृक्ष को
आकाश छूने की चाह थी;
धरती पर खोए सारे रिश्ते
मन में जड़ बनकर बढ़ते रहे।

जी आर कवियुर 
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

वे सब तारे बनकर मिले।

सिला हुआ आसमान

टूटे हुए नीले आकाश के
टुकड़े किसी ने चुन लिए,
यादों के धागों से फिर
बिखरे बादल सिल दिए।

घायल हुई उस साँझ के माथे पर
जब लालिमा की बिंदी खिली,
जो सपने कभी खो गए थे
वे सब तारे बनकर मिले।

हवा की उँगलियाँ छू गईं तो
कुछ सिलाइयाँ ढीली पड़ीं,
फिर भी गिरी हुई रोशनी की किरचें
रात ने बाँहों में भर लीं।

पूरा नहीं है यह आसमान,
फिर भी इसकी सुंदरता कम नहीं;
टूटे हुए दिल को जोड़ लिया जाए,
तो जीवन भी आकाश बन जाता है।

जी आर कवियुर 
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

धूसर सुबह

धूसर सुबह

धूसर रंग में ढली थी भोर,
बिना चमक के जागा था शहर;
ओस से भीगी राहों के बीच
खामोशी करती रही पहरेदारी।

पंछियों की चहचहाहट दूर रही,
हवा को भी जैसे थकान लगी;
कल की परछाइयाँ साथ लिए
सूरज भी धीरे-धीरे चला आया।

खिड़की पर ठहरी आँखों में
आधा-सा सपना खो गया था;
फिर भी दूर बादलों की ओट में
रोशनी का एक बीज उग आया था।

आसमान पर धूसर रंग रहे,
उम्मीद का रंग फीका नहीं होता;
नया दिन जब द्वार खोलता है,
जीवन फिर से मुस्कुराता है।

जी आर कवियुर 
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

नशे में रखा(ग़ज़ल)

नशे में रखा
(ग़ज़ल)
सपने में आकर, जगाकर हमें नशे में रखा,
दिल में ग़ज़ल के नग़मे सजाकर नशे में रखा।

ख़ामोश रातों में चाँदनी बनकर उतरते रहे,
पलकों पे ख़्वाबों को सजा कर नशे में रखा।

जब भी तन्हाई ने दिल को उदास कर दिया,
यादों की महफ़िल को बुलाकर नशे में रखा।

ज़ख़्मों को छूकर भी दर्द का एहसास न होने दिया,
हँसते हुए हर ग़म को भुलाकर नशे में रखा।

राहों में जब भी अँधेरों का साया घिर आया,
उम्मीद का दीपक जला कर नशे में रखा।

लब पर न आया राज़-ए-मोहब्बत कभी मगर,
आँखों से दिल का हाल बता कर नशे में रखा।

“जी आर” ये कैसा असर था तेरी यादों का,
हर साँस को तेरी याद में ढलाकर नशे में रखा।


रचनाकार जी आर कवियूर
09 09 2026

कहीं तो सुनी थी ( ग़ज़ल)

कहीं तो सुनी थी ( ग़ज़ल)

कहीं तो सुनी थी वो मीठी सी आवाज़ याद आता है,
भुला दी थी जो दिल ने बरसों पहले, वो साज़ याद आता है।

हवा छू के गुज़री तो दिल फिर से गुनगुनाने लगा,
किसी अनकही धुन का वही अंदाज़ याद आता है।

चाँदनी रातों में जब ख़ामोशियाँ गीत बन जाती हैं,
तेरे पास बिताया हुआ हर आग़ाज़ याद आता है।

कभी फूलों की ख़ुशबू में, कभी सावन की बूंदों में,
बिना बोले जो दिल ने सुनी थी, वो आवाज़ याद आता है।

वो भूली हुई शामें, वो आँखों में ठहरे हुए ख़्वाब,
हवा में घुला हुआ उनका हर राज़ याद आता है।

न जाने किस जनम से जुड़ा है ये रिश्ता उस धुन का,
जिसे सुनते ही धड़क उठे दिल, वही साज़ याद आता है।

“जी आर” जब भी लिखता है दिल की पुरानी दास्ताँ,
हर मिसरे में अपना ही कोई हमराज़ याद आता है।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
08 09 2026 

Monday, September 7, 2026

यहीं है जन्नत

यहीं है जन्नत

सुंदर स्वर्ग की वो कहानियां,
मन में नई आस जगाती हैं।
सांसों के रुकने पर मिलेंगी,
धर्म की बातें समझाती हैं।

फिर भी कोई जाना न चाहे,
धरती का यह मोह निराला।
हंसते फूलों संग जीने की,
चाहत में हर दिल मतवाला।

बांट सको जब दर्द किसी का,
मिलता सच्चा सुकून यहीं है।
ढूंढने मत जाओ अंबर में,
प्रेम बसे जहां, जन्नत वहीं है।

जी आर कवियुर 
08 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Sunday, September 6, 2026

दरवाज़े पर ठहरी याद

दरवाज़े पर ठहरी याद

दरवाज़ा खुला तो हवा के संग
एक पुरानी खुशबू भीतर आई;
जिस पल को भूला समझा था,
वह फिर आँखों के सामने आया।

आँगन में फूल खिले तो भी
मन में एक खालीपन उतर आया;
कभी यहाँ जो हँसी गूँजती थी,
वह दीवारों पर ठहरी रही।

दरवाज़ा धीरे से बंद किया,
फिर भी याद बाहर नहीं गई;
समय चाहे जितना दूर ले जाए,
कुछ अपनापन घर लौट ही आता है।


जी आर कवियुर 
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

जिस मन का झरना कभी नहीं सूखता

जिस मन का झरना कभी नहीं सूखता

धूप भरी राहों में भी
उसने थोड़ी ठंडक बचाए रखी;
दर्द जब आकर घेरते रहे,
करुणा की राह खुली रही।

समय ने बहुत कुछ छीन लिया,
फिर भी अच्छाई का दीप न बुझा;
थके हुए उन क्षणों में भी
उम्मीद ने साथ नहीं छोड़ा।

सूने आकाश के नीचे भी
आँखें बादलों को ढूँढ़ती रहीं;
दुनिया चाहे सूख जाए सारी,
मन का झरना बहता रहा।


जी आर कवियुर 
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

दूसरे किनारे की तलाश में नाव

दूसरे किनारे की तलाश में नाव

शांत नदी की धारा में
एक नाव धीरे-धीरे चली;
अनजाने किनारे की चाह में
आशा मन में साथ रही।

लहरों का अंदाज़ बदलता रहा,
फिर भी चप्पू थमे नहीं;
पीछे छूटी धरती से बढ़कर
आगे का सपना बड़ा था।

दूर एक किनारा दिखा तो
मन में उजियारा भर गया;
मंज़िल मिलना ही सब कुछ नहीं,
सफ़र भी अनमोल था।

जी आर कवियुर 
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

हवा में बंधी गाँठ


हवा में बंधी गाँठ

हवा संग उड़ते एक धागे में
किसी ने एक गाँठ बाँधी थी;
उसे खोलने की कोशिश में
पुरानी टीस जाग उठी।

ठहरती ही नहीं जब तेज़ हवा,
गाँठ भला कैसे टिक पाए?
अनकहे शब्दों की तरह कुछ रिश्ते
धीरे-धीरे दूर हो जाएँ।

आखिर गाँठ खुद ही खुल गई,
धागा दूर कहीं बह गया;
समय ने चुपके से समझाया—
हर खोई चीज़ नुकसान नहीं।

जी आर कवियुर 
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

अनपहचाना चेहरा

अनपहचाना चेहरा

भीड़ भरी राह में एक चेहरा मिला,
जाने क्यों अपना-सा लगा;
नाम नहीं मालूम, जगह भी अनजान,
फिर भी दिल में ठहर गया।

उन आँखों में कोई कहानी थी,
होंठों पर गहरी खामोशी थी;
वह अनजाना-सा एहसास मगर
पुराना कोई रिश्ता लगा।

वह चेहरा राह से दूर चला गया,
फिर मुड़कर देखा भी नहीं;
फिर भी उसकी छवि आज तलक
यादों से कभी मिट पाई नहीं।


जी आर कवियुर 
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

Saturday, September 5, 2026

आत्मसाक्षात्कार

आत्मसाक्षात्कार
पावन तीर्थों में नहाते हैं हम,
कई व्रत रखकर चलते हैं हम,
धन का दान देकर पुण्य कमाते हैं,
मन न बदले तो फल क्या पाएँ हम?

गंगा सागर जाकर भी क्या होगा,
दान-दक्षिणा देकर भी क्या होगा,
कितने ही व्रत रख लें जीवन में,
ज्ञान बिना फिर मोक्ष कैसे होगा?

पावन नदियों में डुबकी लगाएँ,
क्या मन के पाप सभी धुल जाएँ?
मन की मैल जब तक दूर न होगी,
बाहर की पूजा अधूरी होगी।

अँधेरे में रस्सी साँप लगती है,
उजाला होते ही भूल मिटती है,
यह देह भी एक दिन मिट जाएगी,
आत्मा की सच्चाई समझनी होगी।

बाहर के कर्मों से क्या मिलेगा,
मन का यह प्यासा दिल कब भरेगा?
बाहर नहीं, भीतर हमें देखना है,
आज ही अपना सत्य खोजना है।

केवल आचार से मुक्ति नहीं मिलती,
यह दुनिया भी माया-सी लगती,
गोविंद नाम हृदय में बसाकर,
ज्ञान की राह पर आगे बढ़ना है।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
06 09 2026

तेरी तस्वीर से (ग़ज़ल)

तेरी तस्वीर से (ग़ज़ल)
तेरी तस्वीर से दिल फिर से बेकरार हो गया
एक नज़र क्या मिली, मौसम-ए-प्यार हो गया

तेरी आँखों में जो देखा, वो ख़ुमार हो गया
मेरी तन्हाई का हर लम्हा गुलज़ार हो गया

तेरे ख़यालों ने छुआ जब से मेरे दिल को
सूना-सूना सा ये जीवन भी बहार हो गया

तेरी आहट की तमन्ना में कटी शामें मेरी
हर घड़ी अब तेरे आने का इंतज़ार हो गया

तू नहीं पास मगर साँसों में महकता है
तेरा एहसास ही जीने का करार हो गया

मेरी ख़ामोश दुआओं में तेरा नाम रहा
दर्द भी तेरी मोहब्बत में दिलदार हो गया

“जी आर” अब तो वही ख़्वाब है आँखों में बसा
तेरे मिलने का गुमाँ भी मेरा संसार हो गया

रचनाकार
जी आर कवियुर 
05 09 2026

Friday, September 4, 2026

तेरी यादों की महफ़िल” (ग़ज़ल)

तेरी यादों की महफ़िल” 
(ग़ज़ल)
जब से तुझे याद किया, दिल में हलचल मची है,
तेरी यादों की महफ़िल दिल में हर पल सजी है।

तेरी तस्वीर आँखों में अब तक बसी है,
हर एक साँस में तेरी खुशबू बसी है।

रात तन्हा है, मगर चाँदनी कुछ कह रही है,
तेरी यादों में ये रात धीरे-धीरे ढली है।

दर्द जितना भी मिला, मुस्कुराकर सह लिया,
तेरी चाहत की मेरे दिल में लौ अब भी जली है।

तेरे आने की उम्मीद आज भी बाकी है दिल में,
इसी उम्मीद से ये ज़िंदगी मेरी चली है।

कौन समझेगा भला दिल की ये ख़ामोशियाँ,
हर धड़कन में तेरी ही एक कहानी छिपी है।

जी आर ने भी तुझे दिल से भुलाना चाहा था,
मगर हर बार तेरी याद ही आगे खड़ी है।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
04 09 2026
( तिरुवल्ला , कवियुर) 

कान्हा के चरणों की ओर

कान्हा के चरणों की ओर


घनश्याम बनकर कान्हा आए,
यमुना तट पर मुस्कुराए,
मधुर मुरलिया जब वो बजाए,
गोकुल सारा प्रेम में नहाए।

अष्टमी की वो पावन रात,
झिलमिल करते नभ के तारे,
नंद भवन में दीप जले हैं,
गूँजे हर ओर नाम तुम्हारे।

नन्हे कान्हा की पायल सुन लें,
मुरली वाले के दर्शन कर लें,
माखन चुराकर हँसते कान्हा,
वृंदावन को आनंद से भर दें।

घनश्याम बनकर कान्हा आए,
यमुना तट पर मुस्कुराए,
मधुर मुरलिया जब वो बजाए,
गोकुल सारा प्रेम में नहाए।

राधा के मन में राग हो तुम,
गोपियों के मधुर स्वप्न हो तुम,
दुख हरने वाला नाम हो तुम,
धर्म बचाने वाले श्याम हो तुम।

अधर्म मिटाने धरती पर आए,
दीनों के तुम सहारा बन जाए,
करुणा के नील सागर कान्हा,
कलियुग में तुम दीप जलाए।

जन्माष्टमी की रात सजाएँ,
कृष्ण नाम हम मिलकर गाएँ,
प्रेम दया संसार में बाँटें,
कान्हा के पथ पर कदम बढ़ाएँ।

हरे कृष्णा... हरे कृष्णा...
गोविंदा... गोपाला...
कान्हा के चरणों की ओर,
चलता जाए मन मतवाला...

कृष्ण कृपा बरसे जीवन में,
हर पल प्रेम का दीप जले,
मुरलीधर तुम साथ रहो तो,
हर दुख दूर हो... सुख ही मिले...

रचनाकार
जी आर कवियुर 
04 09 2026
( तिरुवल्ला , कवियुर) 

दिल में छपी बातें (ग़ज़ल)

दिल में छपी बातें (ग़ज़ल)
दिल में छपी बातों को दिल में ही रहने दो,
धरोहर हैं ये यादें, इन्हें महफ़ूज़ रहने दो।

जो ज़ख़्म दिए तुमने, वो ज़ख़्म भी अपने हैं,
इन दर्द के फूलों को चुपचाप ही खिलने दो।

जो ख़्वाब सजाए थे, आँखों ने कभी मिलकर,
उन ख़्वाबों को पलकों पर धीरे से ठहरने दो।

कुछ बात अधूरी है, कुछ राज़ छुपे दिल में,
इन राज़ की परतों को ख़ामोश ही रहने दो।

जो प्यार बचा दिल में, उसको न मिटाओ तुम,
नफ़रत की हवाओं को इस दिल से गुज़रने दो।

कल फिर ये मुलाक़ातें हों या न हों, क्या मालूम,
जो आज मिला हमको, उस पल को सँवरने दो।

‘जी. आर.’ तेरी यादों का ये सिलसिला रहने दो,
जो दिल में बसी मोहब्बत है, उसे दिल में ही रहने दो।

जी आर कवियुर 
03 09 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)

Wednesday, September 2, 2026

സ്വപ്നങ്ങളിൽ — सपनों में 🌹Bilungal gazhal in hindi and malayalam By GR kaviyoor

സ്വപ്നങ്ങളിൽ — सपनों में 🌹
Bilungal gazhal in hindi and malayalam 
By GR kaviyoor 

भर लूँ तुझे आँखों में, जो तू आए स्वप्नों में,
प्रेम के भावों में, भर जाए तू स्वप्नों में।

നിറയട്ടെ നീയെൻ മിഴികളിൽ, നീ വരുമെൻ സ്വപ്നങ്ങളിൽ,
പ്രണയത്തിൻ വികാരങ്ങളിൽ, നിറയട്ടെ നീ സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

जब तू मुझसे दूर होता है,
फिर भी रहती है आसक्ति स्वप्नों में।

നീ എന്നിൽനിന്നകലുമ്പോൾ,
ശേഷിക്കുന്നു ആസക്തി സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

तेरी दी हुई स्मृतियाँ रहती हैं मन में,
दूर होकर भी जागता है अभिनिवेश स्वप्नों में।

നിനവിലും നീ എനിക്ക് നൽകിയതും,
അകലുമ്പോൾ അഭിനിവേശം സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

यादों में बसता है तू हर पल,
फिर भी दूरियाँ बन जाती हैं विराम स्वप्नों में।

ഓർമ്മകളിൽ നിറയുന്നു നീ,
എങ്കിലും അകലുന്നു വിരാമങ്ങളായ് സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

मेरी नस-नस में तू ही फैलता है,
नींद में भी बहते हैं प्रवाह स्वप्नों में।

എൻ സിരകളിൽ നീ പടരുന്നു,
നിദ്രയിലും പ്രവാഹങ്ങൾ തീർക്കുന്നു സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

जी आर का अनुराग भले विरह बन जाए,
मेरे ख़यालों में तू ही, स्वप्नों में।

ജീ ആറിന് അനുരാഗം വിരഹമായി മാറിയാലും,
എൻ ചിന്തയിൽ നീ മാത്രം, സ്വപ്നങ്ങളിൽ.

GR kaviyoor 
02 09 2026

Tuesday, September 1, 2026

इश्क़ का एहसास — പ്രണയത്തിന്റെ അനുഭവംBilungal gazhal by GR kaviyoor

इश्क़ का एहसास — പ്രണയത്തിന്റെ അനുഭവം
Bilungal gazhal by GR kaviyoor 
दिल की गहराई तक जाकर तेरा प्यार महसूस हुआ,
दौलत नहीं, मुझे तेरा इज़हार महसूस हुआ।

ഹൃദയത്തിൻ ആഴത്തിലിറങ്ങി നിൻ സ്നേഹം അറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ,
ധനമല്ല, നിൻ പ്രണയത്തിൻ വിലയെന്നറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

तेरी ख़ामोश निगाहों ने जो बातें कह दीं,
बिन कहे दिल को वही इक़रार महसूस हुआ।

നിശ്ശബ്ദമായ നിൻ മിഴികൾ പറഞ്ഞതെല്ലാം കേട്ടപ്പോൾ,
മൊഴിയാത്തൊരു പ്രണയത്തിൻ സമ്മതമറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

दूर रहकर भी तू दिल के बहुत क़रीब रहा,
फ़ासलों में भी तेरा प्यार महसूस हुआ।

അകലെയായിരുന്നിട്ടും നീയെൻ ഹൃദയത്തിൽ ചേർന്നപ്പോൾ,
അകലങ്ങൾക്കപ്പുറവും നിൻ സ്നേഹമറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

तेरी यादों की महक जब भी चली शामों में,
सूने मौसम में भी बहार महसूस हुआ।

നിൻ ഓർമ്മകൾ കാറ്റിലലിഞ്ഞു വന്ന സന്ധ്യകളിൽ,
വിരഹത്തിലും വസന്തത്തിൻ മധുരമറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

ज़ख़्म कितने भी मिले तेरी मोहब्बत से मुझे,
हर दर्द में तेरा प्यार महसूस हुआ।

നിൻ സ്നേഹം നൽകിയ മുറിവുകൾ ഏറെയായിരുന്നെങ്കിലും,
ഓരോ വേദനയിലും നിൻ സ്നേഹമറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

जी आर, इश्क़ में जब ख़ुद को भुलाया मैंने,
अपने भीतर ही तेरा दीदार महसूस हुआ।

ജി ആർ, പ്രണയത്തിൽ സ്വയം മറന്നുപോയ നേരം,
സ്വന്തം ഹൃദയത്തിൽ നിന്നെ ഞാൻ കണ്ടറിഞ്ഞതേയുള്ളൂ.

GR kaviyoor 
01 09 2026

कहने वाले

कहने वाले

कहने वाले बहुत कुछ कहते हैं,
मीठी बातों से मन भर देते हैं,
लेकिन जब वचन निभाने का समय आता है,
कई लोग पीछे हट जाते हैं।

वादा करना बहुत आसान है,
मीठे शब्द कहना भी आसान है,
लेकिन जब उसे निभाने का समय आता है,
लोगों के पास कई बहाने होते हैं।

शब्दों से ज्यादा मूल्यवान
वचन निभाने वाला मन है,
जो कहते हैं, वही करके दिखाते हैं,
वही जीवन में सच में महान हैं।

 जी आर कवियुर 
31 08 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)