जड़ों से विहीन वृक्ष
माटी की गोद में जगह न पाकर
एक वृक्ष खड़ा है अकेला,
हवा के हाथों झूमते हुए भी
आँखों में वन की स्मृतियाँ लिए।
जड़ों को खोजती हुई नीचे तक
एक लंबी खामोश परछाईं,
जिस मिट्टी को छुआ वह पराई थी,
छाँव को भी अपना घर न मिला।
एक बूढ़ा पंछी आया था,
डाली पर घोंसला बनाने को;
बची हुई हरियाली के बीच
बस बीता कल गाता रहा।
जड़ें नहीं थीं फिर भी वृक्ष को
आकाश छूने की चाह थी;
धरती पर खोए सारे रिश्ते
मन में जड़ बनकर बढ़ते रहे।
जी आर कवियुर
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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