धूसर रंग में ढली थी भोर,
बिना चमक के जागा था शहर;
ओस से भीगी राहों के बीच
खामोशी करती रही पहरेदारी।
पंछियों की चहचहाहट दूर रही,
हवा को भी जैसे थकान लगी;
कल की परछाइयाँ साथ लिए
सूरज भी धीरे-धीरे चला आया।
खिड़की पर ठहरी आँखों में
आधा-सा सपना खो गया था;
फिर भी दूर बादलों की ओट में
रोशनी का एक बीज उग आया था।
आसमान पर धूसर रंग रहे,
उम्मीद का रंग फीका नहीं होता;
नया दिन जब द्वार खोलता है,
जीवन फिर से मुस्कुराता है।
जी आर कवियुर
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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