दरवाज़ा खुला तो हवा के संग
एक पुरानी खुशबू भीतर आई;
जिस पल को भूला समझा था,
वह फिर आँखों के सामने आया।
आँगन में फूल खिले तो भी
मन में एक खालीपन उतर आया;
कभी यहाँ जो हँसी गूँजती थी,
वह दीवारों पर ठहरी रही।
दरवाज़ा धीरे से बंद किया,
फिर भी याद बाहर नहीं गई;
समय चाहे जितना दूर ले जाए,
कुछ अपनापन घर लौट ही आता है।
जी आर कवियुर
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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