Friday, September 25, 2026

सोता नहीं वह दरवाज़ा

सोता नहीं वह दरवाज़ा

आधी रात भी बीत गई,
पर दरवाज़ा अब भी सोया नहीं,
हवा की उँगलियाँ आकर
धीरे से उस पर दस्तक देती हैं।

दहलीज़ के पास पड़ा है
किसी पुराने पदचिह्न का स्मरण,
जो कभी लौटकर नहीं आया,
उसकी परछाईं आज भी वहीं ठहरी है।

ठंडी पड़ी चाबी की दरार में
चाँद एक आँख बनकर ठहरता है,
और भीतर का सारा मौन
बाहर निकलने की राह खोजता है।

कितनी यात्राएँ देखीं इस दरवाज़े ने,
कितनी विदाइयाँ देखीं;
मुस्कुराकर जाने वालों में से
कुछ फिर कभी लौटे ही नहीं।

बरामदे का दीपक बुझ जाए फिर भी
यह दरवाज़ा आँखें नहीं मूँदता,
किसी के लौट आने का विश्वास
आज भी इसमें ठहरा है।

जब भोर की पहली किरण
दहलीज़ पर आकर गिरती है,
तब भी यह खुला नहीं, प्रतीक्षारत रहता है—
क्योंकि उम्मीद के कोई दरवाज़े नहीं होते।

जी आर कवियुर 
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

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