Friday, September 18, 2026

जब घड़ी रुक गई


जब घड़ी रुक गई

दीवार पर समय की सुइयाँ
जब एक जगह आकर ठहर गईं,
दौड़ती हुई ज़िंदगी भी जैसे
एक पल को साँस लेने लगी।

खिड़की के बाहर का नज़ारा
आज कुछ ज़्यादा शांत लगा,
कमरे की गहरी ख़ामोशी में
एक पुरानी मुस्कान सुनाई दी।

मेज़ पर रखी उस तस्वीर में
एक भूला हुआ चेहरा था,
उन आँखों ने मिटा दीं दूरियाँ
जिन्हें बरसों ने बढ़ाया था।

कुछ पलों की कीमत भला
किसी घड़ी से आँकी जा सकती है?
दिल में सँजोई हुई यादों को
समय भी कभी मिटा नहीं सकता।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

No comments:

Post a Comment