दिल में छपी बातों को दिल में ही रहने दो,
धरोहर हैं ये यादें, इन्हें महफ़ूज़ रहने दो।
जो ज़ख़्म दिए तुमने, वो ज़ख़्म भी अपने हैं,
इन दर्द के फूलों को चुपचाप ही खिलने दो।
जो ख़्वाब सजाए थे, आँखों ने कभी मिलकर,
उन ख़्वाबों को पलकों पर धीरे से ठहरने दो।
कुछ बात अधूरी है, कुछ राज़ छुपे दिल में,
इन राज़ की परतों को ख़ामोश ही रहने दो।
जो प्यार बचा दिल में, उसको न मिटाओ तुम,
नफ़रत की हवाओं को इस दिल से गुज़रने दो।
कल फिर ये मुलाक़ातें हों या न हों, क्या मालूम,
जो आज मिला हमको, उस पल को सँवरने दो।
‘जी. आर.’ तेरी यादों का ये सिलसिला रहने दो,
जो दिल में बसी मोहब्बत है, उसे दिल में ही रहने दो।
जी आर कवियुर
03 09 2026
( तिरुवल्ला, कवियुर)
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