Tuesday, September 8, 2026

कहीं तो सुनी थी ( ग़ज़ल)

कहीं तो सुनी थी ( ग़ज़ल)

कहीं तो सुनी थी वो मीठी सी आवाज़ याद आता है,
भुला दी थी जो दिल ने बरसों पहले, वो साज़ याद आता है।

हवा छू के गुज़री तो दिल फिर से गुनगुनाने लगा,
किसी अनकही धुन का वही अंदाज़ याद आता है।

चाँदनी रातों में जब ख़ामोशियाँ गीत बन जाती हैं,
तेरे पास बिताया हुआ हर आग़ाज़ याद आता है।

कभी फूलों की ख़ुशबू में, कभी सावन की बूंदों में,
बिना बोले जो दिल ने सुनी थी, वो आवाज़ याद आता है।

वो भूली हुई शामें, वो आँखों में ठहरे हुए ख़्वाब,
हवा में घुला हुआ उनका हर राज़ याद आता है।

न जाने किस जनम से जुड़ा है ये रिश्ता उस धुन का,
जिसे सुनते ही धड़क उठे दिल, वही साज़ याद आता है।

“जी आर” जब भी लिखता है दिल की पुरानी दास्ताँ,
हर मिसरे में अपना ही कोई हमराज़ याद आता है।

रचनाकार
जी आर कवियुर 
08 09 2026 

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