Friday, September 18, 2026

अनखुला ख़त

अनखुला ख़त

एक पुरानी सी संदूक में
एक ख़त अब भी रखा है,
समय मिटा न सका उन शब्दों को
जो उसमें अब तक लिखा है।

लिखने वाले हाथ बदल गए,
पढ़ने वाली आँखें दूर हुईं,
फिर भी हर एक अक्षर में
कुछ अधूरी बातें छिपी रहीं।

कई बार मन हुआ खोलूँ उसे,
मगर उँगलियाँ रुक गईं,
डर था कि सोई हुई यादें
फिर से जाग न जाएँ कहीं।

शायद कुछ ख़त अनखुले ही
दिल के लिए बेहतर होते हैं,
कहे बिना रह गए जज़्बात
यूं ही पवित्र बने रहते हैं।

जी आर कवियुर 
18 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

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