हवा में बंधी गाँठ
हवा संग उड़ते एक धागे में
किसी ने एक गाँठ बाँधी थी;
उसे खोलने की कोशिश में
पुरानी टीस जाग उठी।
ठहरती ही नहीं जब तेज़ हवा,
गाँठ भला कैसे टिक पाए?
अनकहे शब्दों की तरह कुछ रिश्ते
धीरे-धीरे दूर हो जाएँ।
आखिर गाँठ खुद ही खुल गई,
धागा दूर कहीं बह गया;
समय ने चुपके से समझाया—
हर खोई चीज़ नुकसान नहीं।
जी आर कवियुर
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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