(ग़ज़ल)
सपने में आकर, जगाकर हमें नशे में रखा,
दिल में ग़ज़ल के नग़मे सजाकर नशे में रखा।
ख़ामोश रातों में चाँदनी बनकर उतरते रहे,
पलकों पे ख़्वाबों को सजा कर नशे में रखा।
जब भी तन्हाई ने दिल को उदास कर दिया,
यादों की महफ़िल को बुलाकर नशे में रखा।
ज़ख़्मों को छूकर भी दर्द का एहसास न होने दिया,
हँसते हुए हर ग़म को भुलाकर नशे में रखा।
राहों में जब भी अँधेरों का साया घिर आया,
उम्मीद का दीपक जला कर नशे में रखा।
लब पर न आया राज़-ए-मोहब्बत कभी मगर,
आँखों से दिल का हाल बता कर नशे में रखा।
“जी आर” ये कैसा असर था तेरी यादों का,
हर साँस को तेरी याद में ढलाकर नशे में रखा।
रचनाकार जी आर कवियूर
09 09 2026
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