बंद पड़े दरवाज़े के उस पार
जैसे कोई गुज़र जाता है,
पुरानी लकड़ी की तख़्तियों के बीच
एक आहट धीरे से जागती है।
जब हवा शीशे को छूती है,
परदा हल्के से काँप उठता है,
और समय द्वारा भुला दी गई
एक शाम की ख़ुशबू फैल जाती है।
सीढ़ियों के मोड़ पर
अचानक एक परछाईं उभरती है,
ऊपरी द्वार के पीछे
एक सपना अब भी अनखुला है।
दीवार पर टँगी तस्वीर में
वह मुस्कान अब भी जीवित है,
और खाली पड़ी कुर्सी पर
किसी की मौजूदगी अभी शेष है।
कभी यहाँ गूँजी हँसी की
वह धीमी-सी प्रतिध्वनि,
आज भी गलियारे से होकर
किसी अनजानी राह पर चलती है।
रात गहराती है तभी
यह पुराना आशियाना जागता है;
कोई अदृश्य उपस्थिति
अंदर की गहराइयों को छूती हुई गुजरती है।
सुबह की रोशनी आते ही
सब फिर शांत हो जाता है,
फिर भी बीता हुआ समय
फ़र्श पर अपनी एक रेखा छोड़ जाता है।
लोग भले ही दूर चले जाएँ,
उनके स्नेह का स्पर्श
इन दीवारों के बीच
समय से संवाद करता रहता है।
जी आर कवियुर
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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