तेरी ख़ामोशी ने मुझे
लिखने की आदत दी,
मेरी बदतमीज़ी की
कमीज़ फाड़कर रख दिया।
जो शब्द ज़ुबाँ तक आकर
हर बार लौट जाते थे,
तेरी आँखों ने उन शब्दों को
काग़ज़ पर उतार दिया।
मैं ख़ुद को समझता रहा
बेपरवाह और बेख़बर,
तेरी एक ख़ामोश नज़र ने
मेरा सारा गुरूर उतार दिया।
अब दर्द भी शायरी है,
और ख़ामोशी भी ग़ज़ल,
तूने कुछ कहा भी नहीं—
फिर भी मुझे लिखना सिखा दिया।
जी आर कवियुर
17 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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