वह कदम जो लौटकर नहीं आया
आँगन की मिट्टी पर रह गया
एक कदमों का निशान,
जो मिटने का नाम न लेता था,
द्वार पर ठहरी थी उम्मीद।
कितनी साँझें बीत गईं,
राहें चुप होती चली गईं;
हवा में सुनाई दी हर आहट को
दिल ने समझा — तुम लौट आए।
बारिश आई, राह धुल गई,
फिर भी निशान रहा मन में;
वर्षों के बीत जाने पर भी
यादों की उम्र नहीं बढ़ती।
अंततः समझ आया मुझे —
तुम लौटने वाली दूरी से परे हो;
फिर भी उसी पदचिह्न के पास
मेरा इंतज़ार आज भी है।
जी आर कवियुर
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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