गालों से उतरती वह बूँद
जब चुपचाप धरती पर गिरी,
किसी अनदेखे पल में
धरती ने अपना हृदय खोल दिया।
जो कुछ कह न सके कभी,
वह मौन में घुलता गया,
टूटी हुई उम्मीदें
गहराई में सोती रहीं।
समय की तपती धूप में भी
वह नमी सूख न सकी,
अँधेरे की गहराइयों में
धीरे-धीरे जीवन जाग उठा।
फिर एक सुबह
सूखी डाल पर हरियाली लौटी,
और कभी झुका हुआ हृदय
फिर आकाश की ओर उठ गया।
तभी समझ आया—
विछोह का मौन भी
सृजन की शक्ति रखता है;
नीचे गिरी हर बूँद
रोशनी की ओर उठने का
एक स्वप्न सँवार रही थी।
जी आर कवियुर
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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