धूप भरी राहों में भी
उसने थोड़ी ठंडक बचाए रखी;
दर्द जब आकर घेरते रहे,
करुणा की राह खुली रही।
समय ने बहुत कुछ छीन लिया,
फिर भी अच्छाई का दीप न बुझा;
थके हुए उन क्षणों में भी
उम्मीद ने साथ नहीं छोड़ा।
सूने आकाश के नीचे भी
आँखें बादलों को ढूँढ़ती रहीं;
दुनिया चाहे सूख जाए सारी,
मन का झरना बहता रहा।
जी आर कवियुर
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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