शांत नदी की धारा में
एक नाव धीरे-धीरे चली;
अनजाने किनारे की चाह में
आशा मन में साथ रही।
लहरों का अंदाज़ बदलता रहा,
फिर भी चप्पू थमे नहीं;
पीछे छूटी धरती से बढ़कर
आगे का सपना बड़ा था।
दूर एक किनारा दिखा तो
मन में उजियारा भर गया;
मंज़िल मिलना ही सब कुछ नहीं,
सफ़र भी अनमोल था।
जी आर कवियुर
07 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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