Tuesday, September 8, 2026

मन का रहस्यमय नक्शा

मन का रहस्यमय नक्शा

एक नक्शा है, रेखाओं से परे,
मेरे मन की गहराइयों में,
भटके हुए सपने भी जहाँ
अपने घर की राह पहचानते हैं।

कुछ अनकहे शब्द छिपे हुए हैं
अनदेखी घाटियों के भीतर,
छुए बिना रह गई प्रेम की नदियाँ
चुपचाप बहती हैं अंतर्मन में।

यादों की पहाड़ी ढलानों पर
एक पुराना समय ठहरा है,
जहाँ कदम कभी पड़े ही नहीं,
वहीं अनजाने कल बुलाते हैं।

उस नक्शे को कोई पढ़ न सका,
मैं भी उसकी राहें पूरी नहीं जानता;
हर नई सुबह आँखें खोलती है,
मन एक नई राह फिर बनाता है।

जी आर कवियुर 
09 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

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