जिसे भूल जाना चाहा था,
वही मन में फिर उभर आता है,
जैसे धुंधली-सी तस्वीर में
रंग धीरे-धीरे जाग उठते हैं।
समय से सहलाए घावों पर
जब केवल निशान रह जाते हैं,
कहा न गया कोई एक शब्द
फिर से हृदय में गूँज उठता है।
जो राहें दूर निकल गई थीं,
वे स्मृतियों में लौट आती हैं,
जिन पत्थरों पर कभी चले थे,
वे भी परिचित स्वर में बोलते हैं।
कुछ चेहरे, कुछ पल,
जिन्हें विस्मृति में खोया समझा था,
अचानक हवा के झोंके बनकर
फिर सामने आ जाते हैं।
जिन आँसुओं ने कभी भिगोया था,
वे आज मोती बन गए हैं,
जो समय कभी पीड़ा लगा था,
वही आज एक सीख बन गया है।
भूल जाना मुक्ति नहीं,
स्मृतियों से शांति करना है;
और विस्मृति के उस पार
हमारी प्रतीक्षा में
हम स्वयं ही खड़े मिलते हैं।
जी आर कवियुर
25 09 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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