घनश्याम बनकर कान्हा आए,
यमुना तट पर मुस्कुराए,
मधुर मुरलिया जब वो बजाए,
गोकुल सारा प्रेम में नहाए।
अष्टमी की वो पावन रात,
झिलमिल करते नभ के तारे,
नंद भवन में दीप जले हैं,
गूँजे हर ओर नाम तुम्हारे।
नन्हे कान्हा की पायल सुन लें,
मुरली वाले के दर्शन कर लें,
माखन चुराकर हँसते कान्हा,
वृंदावन को आनंद से भर दें।
घनश्याम बनकर कान्हा आए,
यमुना तट पर मुस्कुराए,
मधुर मुरलिया जब वो बजाए,
गोकुल सारा प्रेम में नहाए।
राधा के मन में राग हो तुम,
गोपियों के मधुर स्वप्न हो तुम,
दुख हरने वाला नाम हो तुम,
धर्म बचाने वाले श्याम हो तुम।
अधर्म मिटाने धरती पर आए,
दीनों के तुम सहारा बन जाए,
करुणा के नील सागर कान्हा,
कलियुग में तुम दीप जलाए।
जन्माष्टमी की रात सजाएँ,
कृष्ण नाम हम मिलकर गाएँ,
प्रेम दया संसार में बाँटें,
कान्हा के पथ पर कदम बढ़ाएँ।
हरे कृष्णा... हरे कृष्णा...
गोविंदा... गोपाला...
कान्हा के चरणों की ओर,
चलता जाए मन मतवाला...
कृष्ण कृपा बरसे जीवन में,
हर पल प्रेम का दीप जले,
मुरलीधर तुम साथ रहो तो,
हर दुख दूर हो... सुख ही मिले...
रचनाकार
जी आर कवियुर
04 09 2026
( तिरुवल्ला , कवियुर)
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