पावन तीर्थों में नहाते हैं हम,
कई व्रत रखकर चलते हैं हम,
धन का दान देकर पुण्य कमाते हैं,
मन न बदले तो फल क्या पाएँ हम?
गंगा सागर जाकर भी क्या होगा,
दान-दक्षिणा देकर भी क्या होगा,
कितने ही व्रत रख लें जीवन में,
ज्ञान बिना फिर मोक्ष कैसे होगा?
पावन नदियों में डुबकी लगाएँ,
क्या मन के पाप सभी धुल जाएँ?
मन की मैल जब तक दूर न होगी,
बाहर की पूजा अधूरी होगी।
अँधेरे में रस्सी साँप लगती है,
उजाला होते ही भूल मिटती है,
यह देह भी एक दिन मिट जाएगी,
आत्मा की सच्चाई समझनी होगी।
बाहर के कर्मों से क्या मिलेगा,
मन का यह प्यासा दिल कब भरेगा?
बाहर नहीं, भीतर हमें देखना है,
आज ही अपना सत्य खोजना है।
केवल आचार से मुक्ति नहीं मिलती,
यह दुनिया भी माया-सी लगती,
गोविंद नाम हृदय में बसाकर,
ज्ञान की राह पर आगे बढ़ना है।
रचनाकार
जी आर कवियुर
06 09 2026
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