बादलों के स्पर्श से जागती पर्वत-ढलानों पर,
जब धुंध की उँगलियाँ धरती को धीरे से सहलाती हैं,
हवा की लय पर पत्ते गाते हैं—
जैसे पहाड़ के भीतर कोई साँस चलती हो।
चट्टानों के मौन हृदय में
छोटी-छोटी धाराएँ जन्म लेती हैं;
घाटियों की ओर बहती हर बूँद में
पहाड़ अपना जीवन बाँटता है।
जहाँ पेड़ काट दिए गए हैं,
वहाँ अब केवल खामोशी उगती है;
जड़ों को खोजती मिट्टी की आँखों में
एक पुराना दर्द उभर आता है।
पहाड़ ने कहा—
“याद रखना, मेरी साँस केवल हवा में नहीं,
तुम्हारी साँसों में भी बसी है;
अगर तुम मेरी रक्षा करोगे,
तो धरती कल भी साँस ले पाएगी।”
इसलिए पहाड़ के सीने पर
आओ, एक पेड़ लगाएँ—
और जब वह बढ़े,
तो हमारे भीतर भी
एक हरी साँस जन्म ले।
जी आर कवियुर
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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