भोर की ओस की बूँदों में
घास की नोकें मुस्कुराईं।
जब कोई देख भी नहीं रहा था,
धरती ने हरियाली ओढ़ ली।
हवा ने आकर जब छुआ,
वे धीरे से झुक गईं।
पैरों के स्पर्श से गुज़रने पर भी
उन्होंने कोई शिकायत नहीं की।
जब धूप की तपिश उतरी,
वे बिना छाँव के भी खड़ी रहीं।
बारिश की एक बूँद मिली तो
फिर से ताज़गी में जाग उठीं।
तभी समझ आया—
सुंदर जीवन के लिए बड़ा होना ज़रूरी नहीं;
छोटा होकर बढ़ना भी पर्याप्त है,
यदि हृदय मुस्कुराना जानता हो।
जी आर कवियुर
17 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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