एक दीपक मौन जलता रहा,
अँधेरे से उसने कुछ न कहा।
बाती पर थिरकी छोटी-सी लौ
चारों ओर आशा बिखेरती रही।
छाया पीछे चलती रही,
प्रकाश आगे राह बनाता गया।
जलते रहने के उस त्याग में
जीवन ने अपना अर्थ पाया।
जिस क्षण वह स्वयं पिघल गया,
दूसरों के लिए प्रभात जन्मा।
प्रकाश की मौन भाषा को
प्रतीक्षारत हृदय पढ़ते रहे।
जी आर कवियुर
02 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर
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