Tuesday, August 11, 2026

भूली हुई घंटी की ध्वनि

भूली हुई घंटी की ध्वनि

एक पुराने मंदिर के आँगन में
एक घंटी निःशब्द खड़ी थी।
बीते वर्षों की उँगलियों के निशान
उस पर जम चुके थे।

कभी उसकी ध्वनि से
प्रभात जाग उठता था।
बिना राह के आने वाले भी
उसकी आवाज़ में दिशा पाते थे।

वर्ष बीतते गए,
किसी ने उसे याद नहीं किया।
फिर एक दिन हवा की उँगलियों ने
उसे धीरे से छू लिया।

अचानक उठी उस घंटानाद में
सोई हुई स्मृतियाँ जाग उठीं।
वह सचमुच भूली नहीं थी—
वह समय द्वारा सँजोकर रखी गई एक पुकार थी।

जी आर कवियुर 
11 08 2026
(तिरुवल्ला , कवियुर

No comments:

Post a Comment