Wednesday, May 6, 2026

भोर की सांस

 भोर की सांस

भोर की सांस जब छूती है,  
धरती चुपचाप जाग उठती है।  
ओस से भीगी पत्तियों पर,  
नया दिन खिल उठता है।  

सूरज की कोमल रोशनी,  
अंधेरे को धीरे हटाती है।  
हवा के निर्मल स्पर्श में,  
मन शांति में बह जाता है।  

पहली किरण के उस पल में,  
आशा जन्म लेती है।  
इस भोर की सांस में,  
जीवन फिर से शुरू होता है।  

जी आर कवियूर  
06-05-2026  
(कवियूर, तिरुवल्ला)

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