साहिल के सपने (ग़ज़ल)
[Raga Suggestion: Bhairavi / Darbari Kanada]
[Qafiya: सपने, गहरे, ठहरे, पहरे...]
[Radif: हैं, हैं]
(मत्ला)
चश्मे के शीशों पर बिखरे हैं सपने, हैं
लहरों की सरगम में गहरे हैं सपने, हैं
(शेर 2)
इस ढलती शाम का मंज़र तो देखो
समुंदर के साहिल पे ठहरे हैं सपने, हैं
(शेर 3)
यादों की महफ़िल सजी है यहाँ पर
इन ठंडी हवाओं के पहरे हैं सपने, हैं
(शेर 4)
अंधेरा जो छाए तो डरना नहीं तुम
उजालों की राहों में सुनहरे हैं सपने, हैं
(शेर 5)
दिलों की किताब को खोल कर देखो
हक़ीक़त की दुनिया से सुनहरे हैं सपने, हैं
(शेर 6)
वक़्त की मौजों ने बदला है रास्ता
मगर दिल के कोने में ठहरे हैं सपने, हैं
(शेर 7)
ख़ामोश रातों की अपनी जुबां है
कहानी सुनाते जो गहरे हैं सपने, हैं
(मकता)
अब मैं 'जी आर' ख़ुद क़लम उठाता हूँ
ग़ज़ल में पिरोता हूँ जो बिखरे हैं सपने, हैं
जी आर कवियुर
24 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)

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