ढलती हुई सांझ के रंगों में,
जलधारा दूर तक फैल गई।
किनारों से रहित उस खामोशी में,
आकाश पानी में घुल गया।
हवा की ठंडी छुअन में,
लहरें धीरे-धीरे बहती रहीं।
दूर कहीं नाव की आवाज़,
खामोशी को छूती चली गई।
उस अंतहीन जलपथ पर,
यादें बहती चली गईं।
अनंत लहरों के साथ-साथ,
मन भी दूर यात्रा पर निकल पड़ा।
जी आर कवियुर
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)
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