Wednesday, May 27, 2026

अनंत जलधारा

अनंत जलधारा

ढलती हुई सांझ के रंगों में,  
जलधारा दूर तक फैल गई।  
किनारों से रहित उस खामोशी में,  
आकाश पानी में घुल गया।  

हवा की ठंडी छुअन में,  
लहरें धीरे-धीरे बहती रहीं।  
दूर कहीं नाव की आवाज़,  
खामोशी को छूती चली गई।  

उस अंतहीन जलपथ पर,  
यादें बहती चली गईं।  
अनंत लहरों के साथ-साथ,  
मन भी दूर यात्रा पर निकल पड़ा।
 
जी आर कवियुर 
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)

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