हवा की ओट में कहीं,
एक छुपा गीत बहता रहा।
सुनने को ठहरे हुए मनों को,
वह हल्के से छूकर गुजर गया।
पत्तों की धीमी हलचल में,
अनकही कहानियाँ बसी थीं।
दूर किसी बादल की परछाईं,
राहों पर धीरे चलती रही।
अनदेखे स्पर्श की तरह,
यादें आकर पास ठहर गईं।
हवा की इस ओट में अब भी,
खामोशी याद बनकर रहती है।
जी आर कवियुर
13 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)
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