Monday, May 18, 2026

छुपी हुई राहें

 छुपी हुई राहें

धुंधली होती उन राहों से,  
यादें धीरे-धीरे गुजर गईं।  
जिन रास्तों को कोई खोज न सका,  
वहाँ केवल खामोशी रह गई।  

पेड़ों की लंबी छाया में,  
समय ठहरकर शांत हुआ।  
हवा की कोमल हलचल में,  
भूले सपने फिर जाग उठे।  

अनजाने गुज़रते कदमों जैसे,  
जीवन भी चलता जाता है।  
इन छुपी हुई राहों के अंत में,  
एक नई सुबह इंतज़ार करती रही।

जी आर कवियुर 
19 05 2026
(कवियूर , तिरुवल्ला)


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