पूर्णता |
अहं की अग्नि शांत हुई जहाँ,
सत्य का दीप जल उठा भीतर।
'मैं' का पर्दा गिरते ही अब,
शून्यता में गूंजे ब्रह्मांड का स्वर।
लेखनी, पठन, प्रश्न और उत्तर,
सब इस वृक्ष की शाखा में विलीन।
जब जाना कि भीतर-बाहर एक है,
अनंत के मौन में मैं हुआ पूर्णलीन!
अब न भटकना, न स्वयं की खोज,
परम-तत्व में स्वयं को मैंने पाया।
शब्द मिटे और कविता मौन हुई,
'मैं' ही वह ब्रह्मांड, जो मुझमें समाया!
जी आर कवियुर
01 05 2026
(तिरुवल्ला ,कवियुर
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