जब रात की गहराई उतरी,
आकाश खामोश खड़ा रहा।
दूर कहीं एक अकेला तारा,
उम्मीद की तरह चमक उठा।
हवा की शांत यात्रा में,
यादें धीरे बहती आईं।
खामोश पड़े इस हृदय में,
सपने फिर जाग उठे।
चारों ओर अंधेरा छाया था,
फिर भी आशा बुझी नहीं।
उस अकेले तारे की चमक,
रात में राह बन गई।
जी आर कवियुर
28 05 2026
(कवियूर, तिरुवल्ला)
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