आंख के पलकों में सन्नाटा जब गहराए
सपनों की लताएँ धीरे-धीरे झर जाए
चाँदनी में खो जाए नदी की रवानी
पंख फैलाए मोर गाए कहानीए
लाल फूलों में चमक जाए ठंडी हवा में
ख्यालों की तस्वीरें मन में उतर जाए
नई उम्मीदों की शाखों पर खिले ख्वाब
पक्षियों के उड़ान में भरोसा लहराए
निश्छल हवा में रोमांच बिखर जाए
सपनों की परछाईयाँ छुप-छुपकर मुस्कुराए
सुख-दुख मिलकर रंग भर जाए दिल के सफ़र में
प्रेम और आशंका एक संग छाए रात की छांवाए
सपनों का सवेरा मधुरता से मुस्काए
कभी खो जाए, कभी लौट आए राह आए
सच्चाई और अद्भुतता दिल में चमकाए
सपनों का सफ़र जी आर के संग लहराए
जी आर कवियुर
30 12 2025
( कनाडा, टोरंटो)
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