हे प्रभु…
शांति… शांति… शांति…
सांस बनकर तू,
चिंतन बनकर तू,
मौन में भी तू ही…
मेरे भीतर बहती हैं
दो पवित्र धाराएँ —
इड़ा — ठंडक की,
पिंगला — अग्नि की,
हृदय गुहाओं में
सांस जप रही है।
सत्त्व —
शांति, ज्ञान, करुणा,
राजस — इच्छा, गति, क्रोध,
तमस — अंधकार, सुस्ती, भय,
सबको पार करके
साक्षी देख रही है।
हे प्रभु…
शांति… शांति… शांति…
सांस बनकर तू,
चिंतन बनकर तू,
मौन में भी तू ही…
पृथ्वी में ठहरी,
जल में भीगी,
अग्नि में प्रज्वलित,
वायु में विचरती,
आकाश में खुलकर
प्रकाश है यह शरीर।
शरीर केवल वाहन है,
गुणों के जंगल में
अग्रसर होने का साधन।
अगर इसके बिना यात्रा नहीं,
यात्रा रुक जाती,
आत्मा और परमात्मा
सत्य में एक हैं।
हे प्रभु…
शांति… शांति… शांति…
सांस बनकर तू,
चिंतन बनकर तू,
मौन में भी तू ही…
मैं जो स्वयं हूँ
उसे जानने के लिए
जनम-जनम के अनुभव भी पर्याप्त नहीं…
हे प्रभु…
शांति… शांति… शांति…
जी आर कवियुर
28 12 2025 / 3:20 am
( कनाडा, टोरंटो)
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