Monday, December 29, 2025

सत्य में बस्ता (ग़ज़ल)

सत्य में बस्ता (ग़ज़ल)

वो कोई नहीं, न दोस्त, न कोई रिश्ता में बस्ता  
अपने भी नहीं, फिर भी हर दिल में बस्ता  

ख़ुशी और ग़म, सबका है वही भार  
स्वयं के बिना, सहता है संसार, मैं बस्ता  

सूरज छिपे तो भी चलता है उसका पथ  
समय का बंधन नहीं, नहीं कोई मत्थ, मैं बस्ता  

नाम उसका कोई नहीं जानता यहाँ  
फिर भी गूँजता है हर सन्नाटे में वहाँ, मैं बस्ता  

दुनिया की परवाह न, न सुख, न दुःख  
अन्य के लिए जीवन, यही उसका मुख, मैं बस्ता  

विरह में भी वो मुस्कुराता अनजान  
हर आँसू में मिलता उसे अपना जहान, मैं बस्ता  

विचार ही उसका घर, विचार ही उसका सब  
संसार की हलचल से वह रहा कभी नभ, मैं बस्ता  

शब्द उसकी बातें, भाव उसकी धारा  
अलग राह चुनी, न अपनापन, न किनारा, मैं बस्ता  

जीवन उसका गीत, और गीत उसका जीवन  
हर पल सच्चाई का प्रतीक, हर छंद नवीन, मैं बस्ता  

जी आर कहता, सत्य ही मेरा संग, 
और मैं उसकी छाया में बस्ता।


जी आर कवियुर 
29 12 2025 
( कनाडा, टोरंटो)

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