““तेरे बिना बसंत” ( ग़ज़ल )
तेरे बिना बसंत भी बेकार लगती है
दिल के आईने भी फीके लगते हैं
आँखों में तैरते हैं सिर्फ तेरे ख्वाब
हवाओं में बिखरी खुशबू भी फीकी लगती है
रात की चादर में चाँद भी शर्माता है
तेरी यादों की चाँदनी भी फीकी लगती है
दिल की तन्हाई में तेरा ही असर है
हर धड़कन बस तेरे ही तक़रार लेती है
वक़्त भी रुक जाता है जब तू पास होती है
साँसें भी तेरी महक से बेकरार लगती हैं
जो भी लिखा है, वो सिर्फ तेरे इश्क़ की खातिर
जी आर की कलम भी तेरे आगे झुकती है
जी आर कवियुर
30 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

No comments:
Post a Comment