समय का एक वृत्त,
शुरुआत और अंत एक जैसे,
दिन अपने भीतर ही लिपटता है,
क्षण शांत प्रतिबिंब में घूमते हैं।
हर अंक एक धड़कन,
हर शून्य एक विराम,
जैसे विचार वहीं लौट आते हैं जहाँ से शुरू हुए थे,
जैसे कविताएँ वहीं खत्म होती हैं जहाँ से जन्मी थीं।
कैलेंडर फुसफुसाता है:
समय में भी साम्य है,
गुज़रते क्षणों में भी लौटाव है।
और फिर भी,
समय में अपनी ताकत है।
जी आर कवियुर
26 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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