सुबह की ओस धीरे-धीरे गिरी, जीवन से भरी
अटूट यादों में उमड़ते भाव
नदी की चमक में सुनहरी रौशनी
ठंडी हवा में पर्वत जाग उठे
फूलों की खुशबू चारों ओर फैली
छोटे पक्षियों की मधुर आवाज़ गूंजती रही
वसंत के रास्ते शांत और खामोश
नीला आकाश कविता की तरह खुला
हवा के झोंके में नृत्य करता
संध्या की मुस्कान ने आकाश को रोशन किया
गर्मियों के गीत में मेरा हृदय भीग गया
और पक्षियों से फिर से गीत बहता गया
जी आर कवियुर
13 01 2026
(कनाडा , टोरंटो)
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