Friday, January 23, 2026

बिंदी अथवा तिलक (कविता)

बिंदी अथवा तिलक (कविता)

भौंहों के बीच ललाट पर  
निशब्द जो चमक उठे एक बिंदु,  
तुरीय अवस्था को शीतलता देने वाला  
ध्यान का कोमल स्पर्श।  

बिंदी नाम से नहीं उसकी सुंदरता,  
समयों ने सहेजी हुई संस्कृति है वह,  
एक ही दृष्टि में कह जाने वाली  
स्वाभिमान की मौन भाषा।  

लाल हो या काली — विषय यह नहीं,  
अंदर की अग्नि और शांति है असल,  
मौन में भी दृढ़ता से खड़ा  
एक सशक्त चिन्ह है वह बिंदु।  

शब्दों से पहले जो बोल उठे,  
एक सूक्ष्म प्रकाश की तरह,  
आभूषण से परे वहाँ  
कुलीनता खिल उठती है।  

मस्तक पर दमकते उस चिह्न में  
इतिहास और विश्वास घुल जाते हैं,  
संस्कृति की गरिमा में  
नारी गरिमामय होकर खड़ी रहती है।

जी आर कवियुर 
23 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

No comments:

Post a Comment