Friday, January 9, 2026

दिल की परछाइयाँ” ( ग़ज़ल )

दिल की परछाइयाँ” ( ग़ज़ल )

दूसरों को हम बताते रहे क्या हो गया
ख़ुद का आईना मगर हमसे छुपा हो गया (x2)

कौन हूँ मैं, क्या हूँ मैं, सवालों में ही उलझा
भीड़ में रहकर भी मेरा दिल अकेला हो गया (x2)

कुर्र्त ढूँढने की आदत ने दिल को जकड़ लिया
सोच का हर एक कोना चुपचाप ही सो गया (x2)

मूल्य बिखरे, नितिकता को हम ढोते ही रहे
लाभ की इस दौड़ में इंसान छोटा हो गया (x2)

जिसे माफ़ करने से दिल हल्का हो सकता था
नफ़रतों के शोर में इंसाफ़ रो गया (x2)

जी आर कहता है — अगर नीयत साफ़ रखी
तो यही दुनिया में सबसे बड़ा धर्म हो गया (x2)

जी आर कवियुर 
09 01 2026
(कनाडा , टोरंटो )

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