Friday, January 16, 2026

माणिक्य वीणा

माणिक्य वीणा

गुप्त ताल में वीणा की धुन धीरे-धीरे फैलती है  
वीणा के तारों में आत्मा जाग उठती है  
तारे तरंगों के साथ आंख मारते हैं  
चाँदनी की चादर में राग फैलता है  

हवा की कोमलता में स्पंदन उठता है  
मन की धाराओं में लय बहती है  
स्मृतियों की नींद में एक सपना पंख फैलाता है  
आसमान की नीली छाया में शांति उतरती है  

जीवन एकांत में नया रूप लेता है  
हृदय स्मृतियों की खुशियाँ बाँटता है  
आशा की नाव में स्वर भरते हैं  
भोर में वीणा की दृष्टि चमकती है

जी आर कवियुर 
16 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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