परदेस में इश्क़ करना मुकम्मल नहीं
तन्हाइयों में ख़्वाब देखना मुकम्मल नहीं (x2)
हर मोड़ पे बिखरते रहे अपने ही साये
इस राह में ख़ुद को पाना मुकम्मल नहीं (x2)
लफ़्ज़ों ने बहुत चाहा तुझे छू लें मगर
ख़ामोशी में हर बात कहना मुकम्मल नहीं (x2)
दिल ने जो निभाई है वफ़ा उम्र भर की
उसका कोई इनाम मिलना मुकम्मल नहीं (x2)
जी आर ने लिखा भी तो दर्द की स्याही से
इस दौर में सच कहना मुकम्मल नहीं (x2)
जी आर कवियुर
10 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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