Monday, January 26, 2026

रात ढली, चाँद भी सो गया… (ग़ज़ल)

रात ढली, चाँद भी सो गया… (ग़ज़ल)

रात ढली, चाँद भी सो गया,  
मेरे अंदर का दर्द ही बाकी रहा।  

तेरी आँखों में भरे अश्कों की आग,  
विरह की तपिश भी बाकी रहा।  

इंतजार की छाया मुरझा गई,  
दिल में बुने ख्वाब ही बाकी रहा।  

सागर की लहरें किनारे से टकराईं,  
लहरों में पीड़ा ही बाकी रही।  

कहे हुए शब्द हवा में उड़ गए,  
अनकहा सच ही बाकी रहा।  

समय सब कुछ मिटा देगा,  
यादों में छुपा दर्द ही बाकी रहा।  

कविता के साथ फिर भी ये 
कवि जी आर का दिल ही बाकी रहा।

जी आर कवियुर 
25 01 2026 
( कनाडा, टोरंटो)

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