मौन के अक्षर टूटे, दिल से सदा आई है
वक़्त आ पहुँचा है अब, बात जुबाँ पर आई है
मीठा दर्द अब तल्ख़ हुआ, खामोशी भी रो पड़ी
जो लबों तक ना आया, वही बात सताई है
यादों की धूप जलती रही, रात सुलगती रही
हर एक ख़ामोश साँस ने, इक आग सुलगाई है
आँखों की चमक फीकी पड़ी, ख़्वाब भी थक से गए
सीने में दबा लावा, आज टूट के बह आई है
पहाड़ों सा जो सब्र था, वो भी अब पिघल गया
दिल कहता है बस इतना, सहने की सीमा आई है
जी आर कहे किससे अब, इस जन्म की ये पीड़ा
वक़्त आ पहुँचा है अब, सच ने राह दिखाई है
जी आर कवियुर
01 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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