“रंग परिवर्त्तन”
हरे-भरे पर्वत और फैली घाटियाँ
फूलों की खुशबू समय को जगाती है
जब हल्की हवा गुनगुनाती है और दूर जाती है
इंद्रधनुष की मनमोहक चमक जगमगाती है
बदलती शाम के रूप
आकाश की रोशनी सुख बिखेरती है
वृक्षों पर जमी ठंडी बूँदें चमकती हैं
मौन दृश्य हृदय को पूरी तरह भर देते हैं
सुबह की परदे में रंगों का रूपांतरण
खिड़की खोलती है दृश्य की सुंदरता
मध्यरात्रि की आँखों में छिपे
सपने ठंडी छाया में पहुँचते हैं
जी आर कवियुर
09 01 2026
(कनाडा , टोरंटो )
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