जनमभूमि के बादलों से छूती यादें
मिट्टी की खुशबू समय को जागरूक करती है
पथों पर घूमती यात्राओं की कहानियाँ
मौन में बिखरी कोमलता की सौगात महसूस होती है
जंगल और हवाएँ पुराने गीत गाती हैं
पुराने पत्थर की दीवारों पर छाँव फैली है
नदियों का खेल-खेल संगीत कानों तक गूंजता है
समय के पंखों पर विचार उड़ान भरते हैं
घास के मैदानों का स्पर्श ठंडक पहुँचाता है
आकाश की रोशनी धीरे-धीरे बिखरती है
किसान ताल में गाते हुए काम जारी रखते हैं
जीवन के सुर हृदय में गहराई से समा जाते हैं
जी आर कवियुर
09 01 2026
(कनाडा , टोरंटो )
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