आधी राह
आधी राह पर ठहर गया हूँ मैं,
साँसों में एक मदमाती मुस्कान है।
कदमों के अर्थ को ढूँढते हुए,
अनजाने छोरों को निहारता हूँ।
कभी-कभी नज़रें नीचे झुक जाती हैं,
सपनों का एक द्वार खुल जाता है।
बिजली की तरह यादें चमकती हैं,
और पल वक़्त संग खेलते जाते हैं।
जीवन-पथ को विस्तृत करने को तैयार हूँ,
पहली किरण की प्रतीक्षा है।
हृदय में आशा का दीप जल उठा है,
और एक नई यात्रा आरम्भ है।
जी आर कवियुर
16 01 2026
( कनाडा, टोरंटो )
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