मर्त्य संहासन हिलते हैं
विनाश की गर्जनें फूट रही हैं
नदियाँ क्रोध में बह रही हैं
हिंसा प्रबल होकर उभरती है (x2)
वितरित सिर इतिहास बन जाते हैं
आँसू और क्रोध साथ में जल रहे हैं
विजय का गर्व नृत्य कर रहा है
न्याय का नाद मिट्टी में समा जाता है (x2)
हृदय की तालों और साँसों में
निर्भरता की धार में फँसा
आत्मा डोल रही है
मौन भी काँप रहा है (x2)
हड्डियों तक क्रोध उठ रहा है
समय अपनी ताल पर चलता है
प्रलय नृत्य जब तक समाप्त न हो
मनुष्य मनुष्य को काटता है (x2)
स्वयं को पहचानो — यही पहली जीत है
भीतर का ब्रह्मांड साँस ले रहा है
बाहर की दुनिया और ताल मिल रही है (x2)
मन एक हथियार नहीं, यह महान शक्ति है
इस क्षण में भय पिघलता है
शांति फैलती है (x2)
बोध के प्रकाश में
आत्मा स्वयं ही हथियार और शरण बन जाती है
मनुष्य अपनी शक्ति को प्रकट करता है (x2)
जी आर कवियुर
11 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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