Friday, January 30, 2026

मेरे अंदर का मैं नहीं जानता (ग़ज़ल)

 
मेरे अंदर का मैं नहीं जानता (ग़ज़ल)



साँसों में बँधे बिना, शाखाएँ बिना  
जीवन का सागर फैला, किनारा बिना  

खड़ा जो बच्चा, उसकी तरह सोचूँ  
सफर की तैयारी, मार्गदर्शक बिना  

मन के किले जो बनाए, धीरे-धीरे  
बिखरते चले, समय के हाथ बिना  

परिवर्तन आते रहे, पकड़ न सका  
समझ के बिना, आँखों के पास बिना  

अंदर की पुकार सुनी कई बार  
संघर्ष करते रहे, उत्तर बिना  

सिफ़ारिश करना और सराहना का मोह  
बंधन में बँधा, स्वतंत्रता बिना  

सबेरे तक सपनों को संजोते रहे  
जाग उठा “जी आर” मैं — स्वयं का ज्ञान बिना

जी आर कवियुर 
30 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)

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