सुनहरी छाया में सांध्य किरण चमकती है
नदी की लहरें धीरे-धीरे झूमती हैं
पहाड़ों के बीच इंद्रधनुष धीरे-धीरे गिरता है
सालाना हवा में यादें मुस्कुराती हैं
प्रकृति की हरियाली हृदय को छूती है
भोर और हवा धीरे-धीरे फैलती हैं
ठंडी जंगलें मधुर और घना संगीत गाती हैं
पक्षी धीरे-धीरे उड़ते हैं, पंख फैलाए
सांध्य फूल गिरते हैं, मिट्टी की खुशबू फैलाते हैं
सितारे प्रकाश फैलाते हैं, छोटे चमकते तारे
गर्मी की बारिश की याद मीठा आनंद लाती है
सांध्य किरण हृदय में मधुरता बिखेरती है
जी आर कवियुर
08 01 2026
(कनाडा, टोरंटो)
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